हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद
मैं भी व्याकुल वह भी व्याकुल सुन ले सब के चांद।
चांद की चांदनी सबको भाई
मुझको तो किंचित भी न भाई ।
हर पल तेरी याद सताये ,
चमक चांदनी मुझको न भाये।
जब है दूर अपने से ही अपना,
बन गया यह दुखदाई सपना ।
मेरी यह सदा तो सुन ले सब के चांद,
हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद ।
तुम तो गए परदेस में हम यहां रह गये ,
हम तो तुम्हारी राह तकते रह गये।
तुम्हारे बिना विरह गीत गाते रहेंगे,
कैसे अपना व्रत पूरा कर पाएंगे।
दिल छलनी सा हो रहा सुन ले सब के चांद,
वह तो है परदेस में देस में निकला है चांद।
सुन सजनी चांदनी हमें लगे घनघोर अंधेरा,
तुम्हारे बिना रात रहेगी न होगा सवेरा।
सजना तुम भी सुन लो मन कैसे लगाऊं,
दिल में जो दर्द है कैसे तुम्हें बताऊं।
कितना भी मनभावन हो मुझ को नहीं सुहाता यह चांद,
तुम तो हो परदेस में देस में निकला है चांद।
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