स्वरचित--
सतीश गुप्ता'पोरवाल'
*शिक्षक दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनायें*
गुरु से ही ज्ञान मिलता है , गुरु से ही प्रेरणा मिलती है। संक्षेप में कहें तो गुरु ही प्रकाश स्तंभ है जिससे जीवन में सही दिशा में बढ़ने का संकेत मिलता है । हमारे जीवन में गुरु के रूप में शिक्षक का बहुत महत्व है, वही हमें सही दिशा का ज्ञान कराता है ।इसी संदर्भ में प्रस्तुत है मेरे साथ घटित एक सच्ची घटना,जिसे कहानी का रूप दिया गया है ।
*गुरु ही गुरु*
आगे की शिक्षा प्राप्त करके,तकनीकी क्षेत्र में जाने से पहले,राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय,बारां में, मैंने कुछ समय के लिए एक शिक्षक के रूप में कार्य किया था। एक दिन की बात है--एक तो गर्मियों के मौसम की गर्मी,ऊपर से बिजली का गायब हो जाना । ऐसे में मैं बाहर आकर पेड़ की छांव में,चबूतरे पर,एक कुर्सी पर बैठ गया । हवा के झोंकों से पेड़ों के पत्ते कुछ-कुछ शीतल बयार का आभास दे रहे थे।हाथों में अखबार के पन्ने पलटता हुआ,समय पर पार पाने की कोशिश कर रहा था। अचानक आवाज आई-भैया थोड़ी देर मैं भी यहां चबूतरे पर बैठ जाऊं ? मैंने सरसरी निगाह डाली और बोला कि हां बैठ जाइए। कुछ समय बाद वे बोले कि भैया क्या एक गिलास पानी मिल जाएगा?मैंने उनकी ओर ध्यान से देखा और कुछ आभास हुआ तो मैंने उनको कहा कि आप यहां कुर्सी पर बैठिये, मैं दूसरी कुर्सी ले आऊंगा और आपके लिए पानी भी लेकर आता हूं । वे सकुचाते हुए उस कुर्सी पर बैठ गए।मैं पानी लेकर आया और उनको दिया। वे एक-एक घूंट करके पानी पी रहे थे और मैं अपनी निगाहें , लगातार,उनके चेहरे पर डालता हुआ पहिचानने की कोशिश कर रहा था।जब वे पानी पी चुके तो मैंने पूछा-क्या आपका नाम छोगालाल जी है ? उन्होंने थोड़े आश्चर्य से उत्तर दिया-हां,यही मेरा नाम है, तुम्हें कैसे पता ? जवाब के बजाय मैंने फिर प्रश्न किया-क्या आप किसी समय, मांगरोल के प्राथमिक विद्यालय में हेड मास्टर थे? अब तो उनका आश्चर्य और भी बढ़ गया और बोले- तुम्हें कैसे मालूम ? अब जबकि मैं उन्हें पूरी तरह पहचान गया था , मैं नीचे झुका और उनके चरण छूकर कहा कि आपके सानिध्य में ही मैंने अपने प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की थी। हर शनिवार को बाल सभा में आप का संबोधन बहुत ही प्रेरणादायक रहता था और वही प्रेरणा हम अपने जीवन में उतार कर आगे बढ़ते जा रहे हैं। फिर मैंने उन्हें बताया कि मैं भी, फिलहाल,एक शिक्षक के रूप में कार्य कर रहा हूं। उन्होंने यह कहते हुए कि अच्छा-अच्छा आज एक गुरु का दूसरे गुरु से मिलन हो रहा है। तो मैंने सिर झुका कर कहा कि नहीं आपके सामने तो मैं शिष्य ही हूं,यह तो गुरु-शिष्य का मिलन है, मैं तो आगे भी,जीवन में शिष्य ही रहना चाहता हूं ताकि जिंदगी भर जहां से जो भी,जब भी प्रेरणादायक मिले उसे ग्रहण करता रहूं। वे गले मिलने के लिए आगे बढ़े लेकिन मैंने एक कदम पीछे कर लिया और उनके चरण छूने के लिए झुकने लगा लेकिन सहसा ही उन्होंने मुझे उठा कर बाहों में भर लिया।
कुछ उनकी आंखों में नमी थी और कुछ मेरी आंखों में।
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