#विषय: जीवन की जिजीविषा क्या है?
दिनांक: 6 सितंबर,
स्वरचित-
सतीश गुप्ता'पोरवाल'
(S.K. Gupta)
व्यक्ति जब बच्चे के रूप में इस दुनिया में आता है बल्कि यह कहें कि उसे इस दुनिया में लाया जाता है तो वह नहीं जानता कि वह इस दुनिया में क्यों आया है । उसकी कोई चाह नहीं होती, जैसे रखा जाता है वैसे ही रहता है, जो खिलाया-पिलाया जाता है वही खाता-पीता है,जो मिल जाता है वही ले लेता है। लेकिन जैसे जैसे वह बड़ा होता है,कुछ समझने लगता है तो उसकी चाहत पैदा होने लगती है। किसी की गोद में जाना पसंद करता है और किसी की में नहीं। कुछ करना चाहता है और कुछ नहीं, इत्यादि ।जब और बड़ा होता है,स्कूल जाने लगता है,वह समझता है कि सब बच्चे जाते हैं इसलिए वह भी जा रहा है, और पढ़ रहा है।समय के साथ उसे लगता है की टीचर बनना कितना अच्छा है और उससे भी अच्छा प्रिंसिपल होना। घर पर उसे लगता है कि वह पापा या मम्मी जैसे होता तो अपने आप कहीं भी आता-जाता,खुद ही कार चलाता,जो मर्जी होती वह खरीदता। जब वह दिन आ जाता है कि खुद कुछ आमदनी करने लायक होता है तो उसकी सोच शुरू होती है कि उसके पास भी बड़ी से बड़ी कार हो ,बड़ा से बड़ा मकान हो,अच्छे से अच्छे कपड़े हों, देश और विदेश की- अच्छे-अच्छे देशों के अच्छे-अच्छे शहरों में भ्रमण कर सके यानी सब कुछ अच्छे से अच्छा हो,और इसके लिए उसके पास अकूत धन होना चाहिए। यह अकूत धन तभी हो सकता है जब वह बहुत बड़ा व्यापारी, उद्योगपति या उसे बहुत बड़ी नौकरी मिल जाए। यानी कि सभी तरह से उसके पास बहुत ज्यादा धन हो तो वह सब इच्छायें पूरी कर पाए।
जिजीविषा तो सबकी होती है लेकिन क्या पूरी हो पाती है ? कुछ लोग तो पहले ही हार मान बैठते हैं और उनका यह कहना होता है कि हमें तो बस दो वक्त की रोटी , सिर पर छत का साया और पहनने को कपड़े हों बस। इससे ज्यादा यह कि बच्चों की पढ़ाई- लिखाई और शादी का खर्चा निकल जाए।कुछ लोग चाहते हैं कि सामान्य या उससे अधिक 'स्टेटस' वाली जिंदगी जीने को मिल जाए । कुछ चाहते हैं कि किसी भी क्षेत्र में एक, दो नहीं तो कम से कम तीन नंबर पर तो उनका नाम हो काम हो और वैसी ही जिन्दगी हो। होता तो वही है जो नसीब में होता है लेकिन जिजीविषा का अधिकार तो सभी को है ।
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