#मानसरोवर_काव्य_मंच
#दिल में उठती तरंगो से
स्वरचित--
सतीश गुप्ता'पोरवाल'
(S.K. Gupta)
दिल में उठती तरंगों से,
सोचता हूं कि क्या लिखूं।
कहानी लिखूं कविता लिखूं,
या फिर लेख लिखूं।
सोचता हूं कुछ तो लिखूं,
लेकिन आखिर क्या लिखूं।
पहाड़ों पर लिखूं
बहारों पर लिखूं।
सूखे पेड़ पत्तों पर लिखूं,
बाढ़ में बहते मकानों पर लिखूं।
जो मन को हर्षाये,
उस पर लिखूं।
या जिस पर तरस आए,
उस पर लिखूं।
लेखनी मेरी पहले सोचती है,
फिर धीरे से कहती है।
जल्दी काहे की जरा रुक,
पहले सोच लें विचार ले।
मन में आते जज्बातों को,
जरा संभाल ले।
यूं ही कुछ भी लिख देगा,
फिर लिखकर मिटा देगा।
अमीरों पर तो बहुत लिखा है,
कभी गरीबों पर भी लिख देना।
अट्टालिकाओं पर तो बहुत नजर थी,
कभी झोपड़ी की और भी देख लेना।
मन में उमड़ते भाव लिखूं,
यानि कि जज्बात लिखूं।
कलम मेरी खाली न रहे,
कोई तो बात लिखूं।
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