*भाषा,संस्कृति ,संस्कार और व्यापार*
किसी भी देश की उन्नति मैं भाषा का महत्वपूर्ण योगदान होता है।जितने भी उन्नत देश हैं जैसे अमेरिका,चीन, जापान जर्मनी फ्रांस ब्रिटेन आदि,इन सब की अपनी भाषा है और अपनी भाषा पर गर्व है। कोई भी विदेशी इन देशों में जाकर बसता है तो उन्हें उनकी भाषा सीखनी पड़ती है लेकिन भारत में कोई भी विदेशी आए उसे हिंदी सीखने की जरूरत नहीं,अंग्रेजी से ही काम चल जाता है।
बच्चों को प्रारंभ से ही अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में प्रवेश दिलाते हैं।बच्चे की हिंदी से दूर अंग्रेजी की प्रवृत्ति यहीं से शुरू हो जाती है। विशेष तौर पर,जो भारतीय विदेशों में हैं वे वहां पर अपने बच्चों से अंग्रेजी में ही बातचीत करते हैं,फल स्वरूप वे यहां आने पर नाना-नानी दादा-दादी आदि से भी संवाद स्थापित नहीं कर पाते। शुभकामना/संवेदना संदेश भी अंग्रेजी में ही दिए जा रहे हैं।भाई,भाई को बेटा, पिता को अंग्रेजी में बधाई दे रहा है।
सामाजिक माध्यम अंग्रेजी भाषा से भरा पड़ा है ।हम देखते हैं कि,दक्षिण भारतीय राज्यों को छोड़ दें तो भी,कई प्रदेशों,जैसे गुजरात महाराष्ट्र आदि में भी दुकानों पर लगे हुए पट्ट स्थानीय भाषा में ही लिखे मिलेंगे।हमारे देश में बनने वाले उत्पाद पर 90 से 100% तक अंग्रेजी में ही लिखा होता है।
हिंदी के मुख्य कहानी/कविता/ साहित्य के "फेसबुक" पटल पर टिप्पणियां भी अधिकतर अंग्रेजी में ही दी जा रही हैं।
*बेचारी हिंदी को अपने प्रचार के लिए, हिंदी दिवस मनाना पड़ता है*
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