शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

जरा -- गजल

 जरा जरा सी बात पर क्यों नाराज  होती हो,

 वह जरा सी बात तो बताओ ना जरा।

  नाराजगी कितनी भी सही हमसे,

 एक नजर तो हमपे डालिये जरा।

 चेहरे पर क्यों इतनी उदासी छाई है, 

 बस एक बार मुस्कुरा दो जरा।

 जिस बात की कसक है दिल में, 

 वह बात हमें तो बताईए जरा। 

 क्यों निर्जल बादलों सी बनी बैठी हो, 

 एक बार तो झूमके बरसो जरा।

 जरा सी आहट से क्यों चौंक जाती हो,

 दिल को मजबूत बनाओ जरा।

  घने बादलों की ओट में क्यों छुपी हो, 

  चांद सा चेहरा तो दिखाइए जरा।

  दूर-दूर हैं एक जमाने से,

 अब तो पास आ जाईए जरा।

 जुल्फों से छुपा रखा है चांद से चेहरे को,

 जुल्फों को चेहरे से तो हटाईए जरा।

  एक बार नजदीक आ जाओ अगर, 

  हम भी आपसे गुफ्तगू कर लें जरा। 

 इस तरह गुमसुम रहना ठीक नहीं,

 प्यार के तराने गुनगुनाईये जरा। 

 अब ना ना छोड़कर हां हां कर दो,

 फिर प्यार की शहनाई बज जाएगी जरा।

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