सोमवार, 19 सितंबर 2022

कुछ पाना रह गया

 इस दुनिया में आकर के अपनी उपलब्धी से आज तक कोई भी संतुष्ट नहीं हुआ।रामचरण जी के परिवार को यूं तो दो वक्त की रोटी नसीब थी , किराए का घर था ,दो पुत्रियां भी थीं लेकिन फिर भी कोई कसक मन में थी। चाह रहे थे कि उनकी दुकान थोड़ी और बड़ी हो जाए,घर में एक बेटा आ जाए, स्वयं का मकान हो जाए , साथ ही एक कार भी यदि वह खरीद सकें तो सोने में सुहागा हो जाए।

  किस्मत ने साथ दिया और उनका धंधा अच्छा चलने लगा,दुकान में सामान भी बढ़ गया, घर में बैटा हो गया और कुछ समय बाद एक,छोटी ही सही पर ,एक जमीन खरीद ली। अब रामचरण जी सोचने लगे कि पास की दुकान भी खरीद लूं तो दुकान और बड़ी हो जाए ,धंधा और अच्छा चले। बच्चा थोड़ा बड़ा हो गया था तो वह एक अच्छे स्कूल में जाए,चाहे फीस कितनी भी जमा करनी पड़े।ईश्वर की कृपा से ऐसा ही हुआ।समय और गुजरा और बच्चा शादी लायक हो गया। अब वे सोचने लगे कि बच्चे की शादी किसी धनी परिवार में हो जाए, जमीन पर मकान बना दूं और बेटे के लिए भी एक दुकान अलग से शुरू कर दूं। लो जी ऐसा भी हो गया, सब कुछ और अच्छा होता चला गया।

 अब रामचरण जी सोचने लगे ,उसे पास की दुकान भी मिल जाए तो दुकान बड़ी हो जाए, बेटा भी अलग से कार खरीदे, समाज में उसका अच्छा नाम हो जाए ।

  सब कुछ उसके हिसाब से होता रहा, किस्मत कुछ ऐसे ही उसका साथ दे रही थी । रामचरण जी की उम्र काफी हो चुकी थी एक दिन वे बीमार पड़े और बीमारी इतनी बढ़ी कि लाइलाज हो गई । उन्हे लगा कि उनका अंत समय नजदीक ही है । अभी भी उनको जीवन से लगाव रहा। प्रार्थना करने लगे -हे ईश्वर अभी तो मुझे बहुत कुछ करना बाकी है-मेरा पोता बड़ा हो  गया, उसकी शादी हो जाए, मकान पर एक मंजिल और चढ़ा दूं , पैसा इतना हो जाए कि मंदिर में और समाज में दान भी दूं। लेकिन अबकी बार ईश्वर ने उनकी नहीं सुनी और वे इस दुनिया से चले गये। जो कुछ उनके मन में था वह मन में ही रह गया ।हालांकि उनको बहुत कुछ प्राप्त हो गया था , लेकिन सच कहा है कि 

 *"सब जग में पाकर के और कुछ पाना रह गया"।*

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