शीर्षक:चल चला चल
स्वरचित-
सतीश गुप्ता'पोरवाल'
( S.K. Gupta)
चला जा रहा हूं,
बस चला जा रहा हूं,
मुझे नहीं मालूम,
मेरी मंजिल है क्या?
बस पता चलेगा अंत में,
कि पहुंचा हूं शून्य में या अनंत में।
साथी कोई नहीं इस सफर में,
शायद मेरे कदमों के निशान बनेंगे,
किसी के लिए दिशा निर्देश,
या तो चलेगा गति तीव्र में,
या फिर गति मंद में।
कुछ भी हो मंत्र तो यही है,
की चल चला चल,
कोई तेरा साथ दे या ना दे,
तू अकेले ही चल चला चल।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें