यूं तो राजेश फक्कड़ प्रवत्ति का था 'ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर' और अपनी ही धुन में मस्त रहता था। साहित्य सृजन का उसे शौक ही नहीं बल्कि जुनून था।जब भी समय मिलता कविता , कहानी , लेख आदि लिखता रहता।कभी पत्रिकाओं में प्रकाशन के लिए भेजता और कभी साहित्यिक 'फेसबुक' पटल पर।
एक दिन वह अपनी बाइक से घर से बाहर निकला ही था कि तुरंत ब्रेक लगाना पड़ा।ब्रेक न लगाता तो आती हुई लड़की से टकरा जाता।राजेश ने कहा- सॉरी बेबी। भाव शून्य चेहरे से उत्तर मिला- बेबी नहीं , महिमा नाम मेरा। राजेश अपने काम पर चला गया लेकिन महिमा का चेहरा उसके दिल में प्रवेश कर चुका था।
एक दिन अचानक महिमा सामने आ गई और कहा -अरे राजेश जी ,आप तो बहुत अच्छे कवि हो। बहुत उम्दा कविताएं लिखते हो और सुनाते हो।राजेश ने आश्चर्य से कहा- तुम्हें मेरा नाम भी मालूम है और काम भी ,कैसे? महिमा ने कहा कि मुझे कविताएं सुनने का शौक है । मैंने आपका 'लाइव' काव्य पाठ "मानसरोवर काव्य मंच" के 'फेसबुक' पटल पर देखा था। कहने के साथ ही उसने राजेश को पास के ही रेस्त्रां में, साथ में, चाय पीने को आमंत्रित किया।राजेश स्वयं ही उसका साथ चाहता था , मना नहीं कर पाया और यह उनकी पहली विशेष मुलाकात बन गई ।
वह राजेश के दिल में बस चुकी थी और वह मन ही मन सपने बुनने लगा था,उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाने का । लेकिन अचानक एक दिन महिमा उसके घर पर आई और उसके हाथ में एक निमंत्रण पत्र देते हुए कहा कि आपको अवश्य आना है । निमंत्रण पत्र देखते ही वह चौंक पड़ा । यह क्या, तुम्हारी शादी हो रही है? महिमा ने कहा कि सबकी होती है और मैं खुश हूं कि मैं जिसको चाहती हूं उससे ही हो रही है। राजेश के दिल को धक्का तो लगा लेकिन फिर संभल गया ,आखिर कवि जो था और कवि जीवन के उतार-चढ़ाव को अच्छी तरह समझता है । संभलते हुए उसने कहा-हां हां अवश्य ही आऊंगा,तुम बुलाओ और मैं न आऊं ऐसा तो हो ही नहीं सकता।
पहले तो राजेश को लगा कि वह हार गया है लेकिन अगले ही कुछ क्षणों में उसका मन स्थिर हुआ और उसने सोचा कि उसको उसका प्यार मिल गया है और ऐसा होना ही चाहिए। इस विचार के आते ही उसको लगा कि वह हारा नहीं है जीत गया है और वह मन ही मन बुदबुदाया कि "यही है प्यार की रीत , जिसमें कभी मिलती है हार तो कभी मिलती है जीत"।
स्वरचित कहानी--
सतीश गुप्ता'पोरवाल'
मानसरोवर, जयपुर ।
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