घर में जब गूंजती हैं किलकारियां,
खिल उठती हैं घर की फुलवारियां।
उम्र जब कुछ और कदम बढ़ाती है,
तो होने लगती हैं अठखेलियां।
बच्चे का जीवन कुछ इस कदर आगे बढ़ता है,
चलता है संभलता है फिर लुढ़कता है।
जब उम्र को पार करता हुआ,
एक मुकाम तक पहुंचता है।
तो फिर दुनिया को पहेली समझने वाला,
दुनियादारी को समझने लगता है।
रिश्ते-नाते दुनिया के ताने-बाने से गुजरता है,
देख दुनिया के करिश्मे रोता है कभी मुस्कुराता है।
उम्र के दौर में गोते लगाते हुए,
जवानी के आते समझता है दुनियादारी।
आती है कई समस्याएं जीवन में
कुछ लगती है हल्की-फुल्की कुछ भारी भारी।
गृहस्थ जीवन में आ जाने पर,
बहुत कुछ समझने और समझाने पर।
अनुभव उसको आने लगता है,
इसी अनुभव से अपनों को भली भांति समझाता है।
भरी उम्र में चेहरे पर आई लालिमा,
फिर उम्र के साथ धूमिल होने लगती है।
धीरे धीरे फिर बुजुर्ग के चेहरे पर,
झुर्रियां यानी सलवटें प्रकट होने लगती है।
चेहरे पर बनी सलवटें तजुर्बे का प्रमाण है,
ऐसी सलवटो को हमारा प्रणाम है।
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