सोमवार, 26 सितंबर 2022

जिंदगी का सफर

 रेलगाड़ी में महेश बड़ा गुमसुम सा बैठा हुआ था ।उसको समझ में नहीं आ रहा था की करे तो क्या करे। वह कौन से स्टेशन पर उतरे और अपना भाग्य आजमाये। अपने शहर से बाहर जाकर उसके मन में व्यापार करने का विचार आया लेकिन कौन से शहर में जाए ,यह तय नहीं कर पाया।

   जयपुर रेलवे स्टेशन से उसने मुंबई का टिकट लिया और फिर गाड़ी में बैठ गया। उसने सोचा कि जहां भी उसका विचार बनेगा वहीं उतर जाएगा और वहीं पर व्यापार शुरू करेगा। स्टेशन आते गए उसका विचार नहीं बना और वह आगे बढ़ता चला गया,अंततः वह मुंबई पहुंच गया ।

  स्टेशन से बाहर आकर वह पशोपेश में पड़ गया कि इतने बड़े महानगर में वह कहां जाए और यहां व्यापार करे तो कैसे?कोई भी जान पहिचान का नहीं है ।

   उसकी जिंदगी में भी ऐसा ही चलता रहा।उम्र के हिसाब से उसने कभी काम नहीं किया । शिक्षा प्राप्त करने के बाद कुछ काम करूंगा , कुछ काम करूंगा यह सोचते सोचते कई साल निकाल दिये। फिर एक स्टेशनरी की दुकान खोली , उससे संतुष्ट नहीं हुआ।  फिर रेडीमेड कपड़ों की दुकान खोली वह अभी भी तो संतुष्ट नहीं था। उम्र निकलती जा रही थी । शादी के आग्रह  आते रहे लेकिन बाद में करूंगा , बाद में करूंगा करते-करते शादी की उम्र भी निकल गई। सब कर लूंगा , जल्दी भी क्या है , यह सोचते सोचते ही उम्र निकलती जा रही थी और वह कुछ स्थिर नहीं कर पा रहा था और अब वह उम्र के इस मोड़ तक पहुंच चुका था जहां लोग नौकरी से सेवा मुक्त होकर निश्चिंत होकर जीवन यापन करते हैं ।वह सोचने लगा कि वास्तव में मेरी उम्र तो बिना रूके सफर कर रही है । उसकी स्थिति वही हो गई थी जो प्रारंभ में बताया गया कि वह निश्चित नहीं कर पाया कि कौन से स्टेशन पर उतरे और अंततः अंतिम स्टेशन तक पहुंच गया।

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