जी हां मैं समंदर हूं । जितना विशाल मेरा तन है उतना ही विशाल मेरा मन और दिल है।कई देशों की , कई नदियों को मैंने पनाह दी है , उनका स्वागत किया है और कहा है कि आओ और मुझ में समा जाओ । कई बड़े बड़े जीव जंतु /छोटी बड़ी मछलियों को मैंने अपने तन के अंदर पनाह दे रखी है। वे घूमती फिरती है , अठखेलियां करती है तो मुझे अच्छा लगता है। मेरे शरीर के अंदर से बड़ी-बड़ी पनडुब्बियों एक जगह से दूसरी जगह यानी मेरे शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक आती-जाती रहती हैं , मैंने कभी उन्हें मना नहीं किया । कई देशों के बड़े बड़े जहाज मेरे सीने को चीरते हुए अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं , मुझे कभी ऐतराज़ नहीं हुआ। मैं शांत रहना चाहता हूं लेकिन मेरे शरीर के अंदर और बाहर इतनी हलचल की जाती है कि कभी-कभी मुझे क्रोध भी जाता है और इसका खामियाजा किसी पनडुब्बी / जहाज को भुगतना ही पड़ता है, जिसका मुझे दुख भी होता है । मैं बहुत ताकतवर हूं ,मेरी भुजाओं में बहुत ताकत है। चाहता हूं कि मेरी इस ताकत का इस्तेमाल मानव मात्र की सेवा के लिए हो।
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