# जिस सफर में हो खो न जाना
स्वरचित-
सतीश गुप्ता'पोरवाल'
जिस सफर में हो खो न जाना ,
रास्ता हो चाहे कितना भी अनजाना।
यों तो इंसान सोचता बहुत है,
सोचते सोचते खो जाता है।
मंजिल कहीं और रास्ता कोई और,
लेकिन किसी और ही निकल जाता है।
जरूरी है जब सफर पर निकले तो,
मंजिल का पता तो हो।
तभी तो तुम्हें तुम्हारे सफर की,
अवश्य ही सफलता हो ।
राह में भटक कर कहीं ,
असफलता के बीज कभी न बोना।
ऐसा कभी भी साथ ना होने देना,
जागते ही रहना है ना कि सोना।
सफर में निश्चय कर लेना है जरूरी,
फिर ना आएगी मध्य में कोई भी मजबूरी।
राह में आती हुई बाधाओं को,
एक के बाद लांघते जाओगे ।
न भटकोगे और न खोओगे,
तो निश्चित तौर पर मंजिल पा जाओगे।
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