बमुश्किल समाये थे नींद के आगोश में,
यूं बेवक्त आकर हमें जगाया न करो।
हमारी तो फितरत है गुमसुम रहने की,
यूं बेवजह आकर हमें हंसाया ना करो।
राहों में चलते हैं मंजिल का पता नहीं,
यूँ आकर अपनी मंजिल बताया न करो।
हम तो अकेले ही मस्त थे जिंदगी के सफर में,
यूं ख्वाबों में आकर मुश्किल में फसाया न करो।
हमें तो कब से इंतजार था तुम्हारे आने का,
यूं न आकर हमें रुलाया ना करो।
अब तो जिद है हमारी अकेले रहने की,
यूं दिल में समा कर हराया ना करो।
जिंदगी हमारी है हम जी लेंगे कैसे भी,
यूं हमें समझा कर वक्त जाया ना करो।
स्वरचित--
सतीश गुप्ता'पोरवाल' ,जयपुर।
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