जिंदगी को सुनिए क्या कहती है जरा पूछिए
स्वरचित-
सतीश गुप्ता'पोरवाल'
जिंदगी को सुनिए क्या कहती है जरा पूछिए,
जवाब मिलेगा जरूर जरा सवाल तो पूछिए।
हम तो जिंदगी में जिंदगी जी रहे थे,
दुखों के चिथड़े को सिल रहे थे।
तो फिर जिंदगी हमारी जिंदगी में क्यों आई,
आकर जिंदगी में क्यों कहर बरपाई।
हम तो बादलों की आस लगाये बैठे थे,
जिंदगी की वर्षा के आसपास बैठे थे।
फिर तूफान और आंधी क्यों आई है,
अपने साथ ओलों की चादर क्यों लाई है।
हम तो दुखों को दामन में समेटे बैठे थे,
ख्वाबों में जीने को ही जीना समझ बैठे थे।
अगर जिंदगी बरसात लाती तो ठीक था,
बहता पानी रहता तो ठीक था।
यही दुखों के ओले जिंदगी को सुन्न किए जाते हैं,
हम इन्हें असहज भाव से सहे जाते हैं।
सुख और दुख साथ साथ चलते हैं,
पर किसी को सिर्फ दुख ही क्यों मिलते हैं।
आखिर कब तक यही सिलसिला चलता रहेगा,
थोड़ा तो समझिए बूझिये।
जिंदगी को सुनिये क्या कहती है जरा पूछिए,
जवाब मिलेगा जरूर जरा सवाल तो पूछिए।
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