सोमवार, 1 अगस्त 2022

बहती हवाएं


मंद मंद बहती हवाएं 

संग लिए नन्ही फुहारें,

 समां बन गया इतना सुहाना 

  अपने प्रियों को बुलाएं ।

 तरस रही थी यह जमीं

 उष्णता में आये कमी,

 सोच रही बादल हो जहां

  वही जाऊं कहीं। 

कागज की कश्ती ज्यों 

बहते पानी में डोल रही, 

मंद मंद मुस्कान यों 

 अधरों से बोल रही। 

कोयल कुहू कुहू बोल रही 

 पपीहा पीहू पीहू बोल रहा,

  मन मयूर नाच उठा

 होले होले डोल रहा।


स्वरचित--

 सतीश गुप्ता'पोरवाल',मानसरोवर,जयपुर।

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