रचयिता- सतीश गुप्ता' पोरवाल'
स्वरचित
आज मन से दिल का झगड़ा हो गया,
और जिंदगी अधर में झूलती रही।
वाकये होते रहे दिन-ब-दिन ,
कुछ याद रहे कुछ जिंदगी भूलती रही।
कशमकश हमेशा होती रही,
एकमत कभी ना हुए ।
कभी दिल हंसे तो कभी हंसे मन,
कभी दिल तो कभी मन गमगीन हुए।
मन तो है चंचल मचल भी जाता है,
मगर दिल है कि संभल जाता है।
समझाता हूं मन को न माने तो क्या करूं,
दिल कहीं साथ ना छोड़े यही सोचकर मैं डरूं।
इच्छा है जो उमड़ घुमड़ कर,
मन और दिल को तौलती रही।
आज मन से दिल का झगड़ा हो गया,
और जिंदगी अधर में झूलती रही।
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