यूं तो दिनेश चंद्र जी के पास किसी बात की कमी नहीं थी।ऐसा भी नहीं था कि पैसा बाढ़ के पानी की तरह आ रहा हो। खेती की कुछ जमीन थी, जिसकी पैदावार से इतना पैसा आ जाता था कि परिवार का खर्चा आराम से चल जाए और कुछ बचत भी हो जाए।बचत भी जरूरी ही थी।एक बेटा और बेटी , दो ही संतान थीं। बेटे का नाम संतोष और बेटी का कविता। उनकी पढ़ाई और शादी में भी तो खर्च होना था।
समय के साथ बच्चे बड़े हो गए , दोनों की शादी हो गई । बेटे को दिनेश चंद्र जी ने समझाया कि अपने पुरखों की जमीन है अच्छी खासी आमदनी हो जाती है,तो वह भी खेती-बाड़ी ही संभाल ले । संतोष ने भी यही उचित समझा और अपनी सूझबूझ और योग्यता से फसल से अच्छी कमाई प्राप्त करने लगा।कविता की शादी एक इंजीनियर राजेश से हो गई। कविता एक सभ्य ,सुशील और समझदार ग्रहणी की तरह अपना परिवार संभाल रही थी ।
कालांतर में उनका खेत एक सरकारी योजना में अवाप्ति में आ गया और उसका अच्छा खासा मुआवजा, सरकार की तरफ से तय हुआ।
यूं तो राजेश काफी सरल प्रवृत्ति का था लेकिन जब उसे मालूम हुआ कि पुश्तैनी खेती की जमीन का अच्छा खासा मुआवजा मिलने वाला है तो उसके मन में लालच आ गया।राजेश ने अपनी पत्नी कविता से कहा कि पुश्तेनी खेती की जमीन का करोड़ों में मुआवजा मिलने वाला है, इसमें तुम्हारा भी आधा हिस्सा होना चाहिए ,तो कविता ने कहा कि यह सब भैया पर छोड़ दो ,जो उचित होगा वे अवश्य ही करेंगे । लेकिन राजेश ने कहा कि बात लाखों की नहीं,करोड़ों की है इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम्हारे भैया 'स्टांप पेपर, पर लिख कर दें कि जितना मुआवजा मिलेगा उसमें से आधा हिस्सा मेरी बहिन कविता का रहेगा । जब तक ऐसा नहीं होता तुम किसी भी पेपर पर साइन नहीं करोगी। यह बात जब उसने अपने भाई को बताई तो वह खिन्न हो गया और उसने कहा कि मुझ पर विश्वास नहीं है क्या? जब मैं कह रहा हूं तो स्टांप पेपर की क्या जरूरत है ? लेकिन राजेश इस अपनी बात पर अड़ गया और कविता को सख्त ताकीद कर दी कि जब तक ऐसा नहीं होता तब तक तुम अपने भाई से न फोन पर बात करोगी और न ही मिलोगी। यदा-कदा राजेश कविता का फोन भी देख लिया करता था कि कहीं वह अपने भाई से बात तो नहीं कर रही हो।
समय गुजरता गया और रक्षाबंधन का त्यौहार आ गया।दोनों , भाई-बहिन में बेचैनी बढ़ती जा रही थी।दोनों के ही दिमाग में पुरानी यादों का समय चक्र घूमने लगा - किस तरह से पूरे धूम-धाम से रक्षाबंधन का त्यौहार मनाते थे और कविता जितने प्रेम से भाई को राखी बांधती थी,उतने ही प्रेम-भाव से उसे तोहफा मिलता था। लेकिन आज संतोष बहुत उदास था। उसे ,पूरी तरह से,लग रहा था कि आज उसकी बहिन नहीं आएगी और कविता को भी लग रहा था कि वह भाई को राखी बांधने नहीं जा पाएगी। दोनों ही उदास हो चले थे।
इसी सोच- विचार में संतोष बैठा हुआ था कि अचानक सामने से मुख्य द्वार खुला और कविता आती हुई नजर आई। संतोष के चेहरे पर खुशी छा गई, और उसने कहा कि क्या जीजाजी ने तुम्हे यहां आने की इजाजत दे दी?तो कविता ने कहा कि मैं तो बिना बताये ही आई हूं ।भैया ऐसा है ना कि पति के साथ तो ,कहते हैं कि, सात जन्मों का रिश्ता होता है लेकिन मैं मानती हूं कि भाई-भाई या भाई-बहिन का रिश्ता तो जनम-जनम का होता है।अब जो होगा देखा जाएगा, आप तो हाथ आगे करो। संतोष ने अपनी कलाई आगे कर दी और कविता ने तिलक और अक्षत लगाकर राखी बांधी। दोनों, भाई-बहिन की आंखों से अश्रु धार बह निकली और टप-टप आंसू फर्श पर गिरकर एक हो गए। कहना मुश्किल था कि कौनसे आंसू भाई के थे और कौन से बहिन के।
भोजन करने के पश्चात जब कविता वापस घर की ओर लौट रही थी तो उसे महसूस हुआ कि आते समय उसके पैरों में भारीपन था, लेकिन जाते समय कदम ऐसे उठ रहे थे जैसे वह हवा में उड़ रही हो।
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