#हर कदम को जमीन कहाँ मिलती है
हर कदम को जमीन कहां मिलती है,
हर किसी को जिंदगी हसीन कहां मिलती है।
चाहता हूं मैं भी आसमान में उड़ना,
उड़कर फिर तारों तक पहुंचना।
बेजार हूं मैं अपने मुकद्दर से ,
ढूंढ रहा हूं उस सितारे को,
जिसे होना था मेरे मुकद्दर का,
जिसे बनाना था मुझे सिकंदर सा।
पकड़ लूं सितारे को मुट्ठी में कभी न छोडू
दिल के पाटों के बीच उसे मसल दूं।
लेकिन वास्तविकता से मुह नहीं मोड़ा जा सकता,
जो होना है उसे तोड़ा नहीं जा सकता।
किसी कदम को जमीन नहीं मिलती,
तो किसी जमीन को कदम नहीं मिलता।
स्वरचित--
सतीश गुप्ता'पोरवाल',
मानसरोवर, जयपुर।
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