गुरुवार, 4 अगस्त 2022

चौपाल

*चौपाल*


 मैंने गांव में चौपाल को कल सपने में देखा,

राम,हरी और गोपाल को वहां सदमे में देखा।

बैठे थे तीनों वहां गुमसुम से,

मुझे भी सदमा लगा कसम से।

खिलखिलाते थे जो किसी बात पर,

निराश नहीं होते थे किसी हाल पर।

 मैंने पूछा तुम्हारे चेहरे पर यह उदासी क्यों छाई,

वे बोले तुम्हें बहुत दिनों बाद हमारी याद आई।

 तुम तो पहुंच गए दूर यहां से शहर 

इतने दिनों तक नहीं ली हमारी खबर।

  हम तो बस रह गए इसी गांव में,

 बैठे रहते हैं हर शाम यहां नीम की छांव में ।

क्या तुम्हें याद नहीं आता खेतों से चने के पौधे उखाड़ना ,

फिर पकड़े जाने पर अपने अपने कान पकड़ना ।

 स्कूल में फर्नीचर को उठाकर फेंकना,

  फिर मार पड़ी तो हाथों को सेंकना ।

वो पतंगों का आसमान में उड़ाना ,

फिर वो काटा-वो काटा चिल्लाना।

 कभी गिल्ली डंडा कभी सिथोलिया ,

 यह सब तो तुमने भुला ही दिया ।

हम शाम को इसी चौपाल पर बैठते थे,

 फिर घंटों जाने क्या-क्या बातें करते थे।

 सपना पूरा भी न हुआ था कि बेटी ने जगाया ,

मैंने चौपाल को कल सपने में देखा तो

बचपन याद आया।


स्वरचित-

 सतीश गुप्ता'पोरवाल',

 मानसरोवर,जयपुर ।

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