हमें तो प्रेम की गंगा बहाने का शौक है,
लेकिन कितना अंतर आ जाता है लहजों में ,
हमने जिसे प्यार से सरोबार किया,
कोई जख्म दे गया लफ्जों में।
खंजर भी चलाए गर कोई कोई गम नहीं,
उस जख्म में इतना दर्द नहीं होता।
लफ्जों के बाण जब चल जाते हैं,
दिल उष्ण हो जाता है सर्द नहीं होता।
बहुत कोशिश की हमने जख्मों को भरने की,
लेकिन यह जख्म तो अब नासूर हो गए।
हमने तो उनसे नज़दीकियां ही मांगी,
लेकिन वो हमसे क्यों दूर हो गए।
जाने क्यों लोग दिल में क्या लिए बैठे हैं,
क्या बुरा है दो मीठे बोल बोल देने में।
नीम की कड़वाहट को तज कर ,
भला है वाणी में शहद घोल देने में।
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