मंगलवार, 24 जनवरी 2023

विश्वास की डोर- कविता

बंधन तो हो जाता है अनजानों या जानो का,

 अजीब समीकरण है इस जग में रिश्तो का।

 रिश्तो की डोर बंध जाए कभी शैतानों से,

 और कभी बंधन हो जाए फरिश्तों का।


 रिश्ते कुछ पल के हों या जनम जनम के,

 होते हैं विश्वास पर हीआधारित।

 गुण अवगुण तो होते हर इंसान में,

 लेकिन भौतिक रूप से होना है सामाजिक।


 बहुत महीन है विश्वास की डोर,

 पल भर में कट जाती है।

 ओर न  छोर मिल पाता है,

 लालसा हो तो मन भटकाती है।



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