गुरुवार, 5 जनवरी 2023

जाते जाते-- कविता


यूं न अपने नैनों से नीर बहाते,

मन के भावों को हम यूं न दबाते।

इतना भी क्या रंज छुपा था दिल में,

 जाते जाते कुछ तो कह जाते। 


 हम तो थे सब अपने ही,

 क्यों गैरों संग हमें बिठाया।

 समझ नहीं थी ग़र हमें जो 

 कुछ तुम ही हमको समझाते।


कुछ बातें अनजाने में हो जाती हैं,

 क्यों दिल से तुमने उन्हें लगाया।

 दिल खोलकर जो हमसे कह देते,

  हम खंडहर की भांति ढ़ह जाते।


नेह कितना है दिल में हमारे ,

यह तुम्हें बतला न  पाये।

संग सरिता में हम भी बह जाते,

 ग़र जाते जाते कुछ तो कह जाते।

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