सच है सफर में हूं सफर में रहा हूं ,
जिंदगी को जिंदगी की तरह जी रहा हूं।
जिद करके अपनी अलग राह नहीं चुनी,
नदिया की धारा के साथ बह रहा हूं।
जिंदगी में मोड़ तो अनेक आए ,
किधर जाऊं इस असमंजस में नहीं रहा हूं,
प्रकाश स्तंभ मुझे जिस ओर नजर आया,
मैं उस ओर ही बढ़ता जा रहा हूं।
क्यों छुपाऊं दुनिया से यह राज मैं,
अपने सपनों को करीने से सजा रहा हूं मैं।
साजों के ढेर हैं इस दुनिया में,
मुग्ध कर दे सभी को वह साज बजा रहा हूं मैं।
सूरज निर्विघ्न रूप से रोशनी फैला रहा,
चाँद भी रूपसी बन चाँदनी में नहला रहा।
क्यों रहता मैं किसी से भी कम,
जिंदगी का सफर निर्बाध चलता रहा।
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