शनिवार, 7 जनवरी 2023

युग बीते नव सृजन-- कविता

युग बीते नव सृजन को,

 फिर लालायित हुआ मन।

बीते युग को किया नमन,

और आगत का अभिनंदन ।


युगों युगों से है धरती,

न जाने कब इसका सृजन हुआ।

 यह क्रम बना रहे अविरल,

 ऐसा होना कठिन हुआ।


 कुछ चल पड़े एक ही राह पर,

 उनको मंजिल का न दर्शन हुआ,

 सोच समझकर राह चुनी तो,

 उद्देश्य उनका सफल हुआ।


स्वयं,परिवार,समाज देश के लिये,

क्या,क्यों,कैसे, जैसे करना है।

इन सब पर चिंतन मनन करें,

युग बीते अब नव सृजन करें।

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