इस जगत में इंसान से इंसान में, परस्पर व्यवहार में ,विश्वास का बहुत बड़ा स्थान है।व्यक्ति चाहे परिवार के हों , व्यवहार के हों या अजनबी हों एक दूसरे से विश्वास के बल पर ही जीवन में आगे बढ़ते हैं।
जीवन में विश्वास का बहुत महत्व है, लेकिन विश्वास के साथ ही दो शब्द जुड़ जाते हैं - एक है अंध और दूसरा है घात ।
जब विश्वास होगा तभी विश्वासघात और तभी अंधविश्वास हो पाएगा। बिना विश्वास के ना विश्वासघात होगा और ना अंधविश्वास ।
आज हम विश्वास और अंधविश्वास के बारे में ही बात करेंगे । सबसे पहले व्यक्ति को ईश्वर पर विश्वास होता है, यह पूर्ण विश्वास है या अंधविश्वास यह विवाद का विषय है। अधिकतर लोग मानते हैं कि ईश्वर है, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो नहीं मानते हैं। प्रामाणिक या प्रायोगिक रूप से सिद्ध नहीं किया जा सकता कि वास्तव में ईश्वर है,और ऐसे लोग ईश्वर को मानना एक अंधविश्वास ही मानते हैं।
समाज में देवी देवताओं के प्रकोप पर भी विश्वास किया जाता है। तरह-तरह की पूजा /यज्ञ किए जाते हैं। मनोरथ सफल हो गया तो विश्वास हो जाता है और नहीं हुआ तो अंधविश्वास। यानी कहा जाएगा कि यह तो अंधविश्वास है। ऐसी कई सामाजिक और धार्मिक रीतियां चली आ रही हैं जिन पर लोगों को पूर्ण विश्वास है किंतु ऐसे भी लोग हैं जो उनको नहीं मानते यानी इसे अंधविश्वास मानते हैं ।
हम कह सकते हैं कि विश्वास और अंधविश्वास, मानव की अपनी प्रकृति और सोच पर निर्भर करता है। कभी विश्वास करने वाला अंधविश्वासी जाता है और अंधविश्वासी भी विश्वासी हो जाता है,परिस्थितियों पर निर्भर करते हुए।
*अतः यह कहा जा सकता है कि विश्वास और अंधविश्वास में महीन अंतर है।*
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