जैसे समंदर किनारों को बुहारता है,
जैसे माली उपवन को संभालता है।
वैसे ही खुशियों का एक एक पल,
संग आकर मेरे जीवन को संवारता है।
अनभिज्ञ रहा मैं जीवन के रंगढंग से,
रंग रहा था अपने को अपने ही रंग से।
दिल मेरा खुशियों का डेरा पहिचानता है,
लेकिन दर्द... ये कम्बख्त मेरा घर जानता है।
दूर से ही देखकर दर्द को,जी घबराया,
नमस्ते,आदाब,सतश्री अकाल भी फरमाया,
लेकिन दिल न पिघला , रौद्र रूप दिखाया,
रौद्र रूप दिखा कर अपना, मुझे खूब डराया।
भोर की किरणों से मेरा घर जगमगाये,
रात का तिमिर न कभी आकर डराये।
कम्बख्त दर्द को दिशाहीन कर दूंगा,
जीवन मे खुशियां ही खुशियां भर दूंगा।
स्वरचित-'
सतीश गुप्ता पोरवाल
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