मंगलवार, 31 जनवरी 2023

मुक्तक/शेर

 तेरी रुसवाई रात भर रुलाती रही,

 रोज़  रोज़ रंजिशें राह में आती रहीं,

 रुख से रुख मिलाने का हौसला रख,

रंजिशें रुसवाई का रोना रोना ठीक नहीं।(1)

इस कदर वह छुप छुप कर मुझे देखती रही,

तो कहीं मेरा दिल नाजनी तक आ न जाये।(2)

इस तरह ग़र तुम मुझसे मिलती रहीं,

 तो कहीं हम एक होने तक आ न जाएं।(3)

जश्न हमारी हार का उन्होंने मनाया होगा, 

रिश्ता इस कदर दुश्मनी का निभाया होगा।(4)

सेवा करवाने का मुझे कोई शौक नहीं,

 मैं तो बस सेवक ही बनना चाहता हूं ।

 श्रीराम बनने की तो मेरी औकात नहीं,

 मैं तो बस केवट ही बनना चाहता हूं।(5)

और कहीं क्यों देखूं मैं मन के सिवा,

मन को ही देखूं मन ही तो दर्पण है। 

 ईश्वर जो कुछ दिया है तुमने मुझको 

 तेरा ही है, तुझको ही अर्पण है।

  मैं तो एक मुर्ख इंसान इस जहां में,

 मुझमें कहां इतनी समझ है।

 और कोई ठौर नहीं मेरे लिए,

 तेरे ही चरणों में मेरी जगह है।(6)

 प्रारूप को अंजाम तक पहुंचाने में हमने की कड़ी मशक्कत, 

 और उनका कहना है कि यह तो है एक संयोग फकत।(7)

                 . ************** 

 उसने कहा करो कोई काम ऐसा जिसमें हो मशक्कत,

  कर डाली हमने एक सिरफिरी हसीना से मोहब्बत ।(8)

 कविता नहीं है महज कुछ शब्दों की जमावट,

  यह तो है शब्दों की खूबसूरती से सजावट।(9)

खुद से उम्मीद थोड़ी भारी रख, 

चुका देगा कभी तो,थोड़ी उधारी रख।(10)

झुकना नहीं खामखां किसी के सामने, 

 अपने आपमें इतनी तो खुद्दारी रख ।(11)

जिधर देखो उधर,उसे कोई हमदर्द नजर आता नहीं, 

  लेकिन जिधर हमदर्द है,उधर तो नजर घुमाता नहीं।(12)

कवि की कल्पना का कोई छोर नहीं,

 यह जा सकती है किस ओर नहीं।

 कभी जा पहुंचे सागर की गहराइयों में,

 और कभी उड़ जाये नभ की ऊंचाईयों में।(13)

 जो मिलना था जिंदगी से वह नहीं मिला, 

फिर भी मुझे नहीं जिंदगी से कोई गिला।

जिंदगी को मैंने तो सब  कुछ दिया, 

शायद इसी का मिला है मुझे यह सिला।(14) 

सुकून की तलाश में था इधर से,

 किसी ने कहा मिलेगा उधर से।

 इधर से उधर ही डोलता  रहा,

 न जाने मिलेगा किधर से।(15)


हसरतों का बोझ लिए फिरते हैं यहां वहां,

वादे ही वादे मिले हम गये जहां जहां।

किस्मत ही जब नहीं साथ हमारे,

तुम ही बताओ आखिर हम जाएं तो जाएं कहां।(16)

यूं ना शरमा मुझसे,बस मुस्कुरा दे,

 तेरे गालों पर गड्ढों को मैं देखता रहूं।

 मुझे देख कर तू रचना करे,

 मैं तुझे देख कर गीत गाता रहूं।(17)


स्वरचित- सतीश गुप्ता'पोरवाल',जयपुर।





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