मंगलवार, 17 जनवरी 2023

प्रभात वंदना- कविताएं

अब और न किसी की कामना है,

 जब तेरे चरणों में चारो धाम हैं ।

  हर पहर तेरी ही सेवा में रत रहूं,

   बस अब यही मुझे एक काम है।


तेरी ही कृपा से मेरा लेखन है,

निरंतर मन में होता चिंतन मनन है। 

भाव प्रवाह होता तेरी ही कृपा से 

नित नई कविता का होता सृजन है।


आओ मन से स्वागत करें ऋतुराज बसंत का,

पीली पीली सरसों से आई बहार का ।

सर्द सर्द सा दिन है,मनभावन है 

जय जय कृष्णा का जैसे वृंदावन है।


  हे परमपिता जब तक है साँस में साँस,

निष्काम भाव से करता रहूं मैं हर काम।

 कपट छल कभी मेरे निकट भी न आवे,

जीवन भर निश्चल मन से ही काम सुहावे।

बाहर की दुनिया मुझे कितना भी ललचाये,

 कोमल मेरा मन कहीं फिसल न जाये।

  जपता रहूं तेरा ही नाम सुबह और शाम,

 किसी और का नहीं अंतर्मन में बसा है तेरा नाम।


 और किसी को क्यों देखूं मैं,

मेरे मन मंदिर में तू ही बसा मेरे सांवरे।

 किसी और के संग क्यों जाऊं मैं,

  बड़ा प्यारा लगता संग तेरा रे। 

जनम जनम के दुख हर लेना,

 अब मुझे बस तेरा ही सहारा रे।

   दिन-रात करूं मैं तेरी ही पूजा,

  यह जग झूठा तू ही बस सच्चा रे।


पूरा ना मिले,मिल जाए बस आधा,

 हां यही है मेरी अभिलाषा।

 साक्षात मिलो या ना मिलो मेरे श्याम,

 पर कोई रूप दिखाने को तो आजा।

 किस विध प्रवेश पाऊं मैं,

 खिड़की खुली है पर बंद है दरवाजा।

 सदा साथ रहे न रहे गम नहीं,

मिलने का एक बार तो कर ले वादा।

 कुछ तो बोल ए मेरे परमपिता ,

 कम बोलेगा पर समझूंगा ज्यादा ।

पूरा न मिले,मिल जाये बस आधा ।


जग है झूठा  बस मैं ही सच्चा ,

 यह विचार है मिथ्या।

 माया के पीछे क्यों भागे 

 जग का बच्चा बच्चा ।

अंतर्मन में ध्यान धरो तो,

समझ में आए प्रभु की माया।

 हिय विचार ही सच्चा है,

  झूठी है यह काया।


हे शिव शंकर हे भोलेनाथ,

गले में लिपटा जहरीला नाग।

न्यूनतम आवरण धारण किये,

गहन शक्ति  से बने शक्तिमान।

बिगड़े काज बने जग माहि,

जब जब लिया भोले का नाम।

सारे जग के हे पालनहार,

तेरा ही नाम जपूं सुबह और शाम।


भव सागर में डोल रही है नैया,

 नहीं साथ में कोई खिवैय्या।

विषय वासना त्याग चुका हूं,

अन्तर्मन खंगाल चुका हूं।

मैल धो-धो निर्मल किया है मन,

और कितनी परीक्षाएं  लोगे भगवन।


 खुशियों के पल डरे डरे, 

 मेरे नयन नीर भरे।

 ओ कान्हा अब तो सुन ले,

 मेरे लिए कुछ खुशियां चुन ले।

 मैं भी घूमूं खुशियों के मेले में,

कब तक रहूंगा गमों के झमेले में।

ओ कान्हा तू दूर नहीं पास है,

बस अब तो तू ही मेरी आस है।

 





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