गुरुवार, 5 जनवरी 2023

ऊंचे दरख्तों से-- कविता


ऊपर की ओर देखो आसमां की ओर देखो,

 आसमां की ऊंचाई का क्या अंदाजा लगाओगे।

 मापने को कितने भी दरख़्त लगा लो,

  ऊंचे दरख्तों से आसमां नहीं झुकेगा।


 चाहें अनेक है जितना चाहो चाह लो,

 कोई बंदिश भी नहीं चाहने पर।

 कमर कस ही ली है कुछ करने को,

 तो भला फिर कोई क्यों रुकेगा।


रास्ते अनेक है दुनिया के मेले में, 

भटकाने को बैठे हैं ये अनेक रास्ते। 

 समझ बूझ कर जो चुन लेगा,

तो भला कोई गलत राह पर क्यों मुड़ेगा।


  गर दिल बड़ा और दिमाग खुला है,

  तो कोई अपनी ही नहीं चलाएगा।

  भले लोगों की भली बात अवश्य सुनेगा,

 क्योंकि ऊंचे दरख़्तों से आसमां नहीं झुकेगा।

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