गांव रामपुर नदी किनारे बसा हुआ था। नदी में भरपूर पानी रहता था जिससे वहां रहने वाली अपनी खेती- बाड़ी की सिंचाई करते थे और अच्छी फसल प्राप्त करते थे। एक साल ऐसा हुआ कि बरसात के मौसम में,आधा मौसम गुजरने के बावजूद भी बरसात नहीं हुई। नदी का पानी कम होता गया, और वह लगभग नाले में तब्दील हो गई।गांव वाले चिंतित हुए,नदी में पानी नहीं आया तो सिंचाई कैसे होगी, फसल भी नहीं आएगी और जीवन यापन कैसे होगा?सभी गांव वालों ने निर्णय किया कि एक यज्ञ किया जाए और इंद्र देव से कृपा करने की प्रार्थना की जाए। सही समय पर यज्ञ प्रारंभ हुआ , सब ने बढ़-चढ़ कर खूब आहुतियां दीं और इंद्र देव से प्रार्थना की कि है ईश्वर जमकर पानी बरसायें ताकि नदी में भरपूर पानी आ जाए। यज्ञ से इंद्रदेव प्रसन्न हुए और कुछ ही समय में आसमान में बादल छा गए,तेज हवाएं चलने लगीं और बिजली भी चमकने लगी।बरसात का प्रारंभ हुआ लेकिन यह क्या ! बरसात बहुत तेज हुई और रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। नदी में पानी बढ़ता जा रहा था धीरे-धीरे पानी ने विस्तार लिया और बाढ़ का रूप ले लिया।पानी इतना आ गया कि गांव के मकान आधे से ज्यादा डूब गए।गांव में अफरा-तफरी मच गई। कुछ लोग तो ऊपर छप्पर पर चढ़ गए। गांव की एकमात्र नाव से कुछ लोगों को सुरक्षित स्थान पर ले जाए जाने लगा। कुछ महिलाएं अपने बच्चों को लेकर कमर तक के पानी में सुरक्षित स्थान पर जाने लगीं।कुछ लोगों ने गुहार लगाई- हे इंद्रदेव!आप क्यों रूठे हो, हम से ऐसी क्या गलती हो गई।
सहसा आकाशवाणी हुई- "मैंने तो तुम्हारी ही प्रार्थना स्वीकार की, तुमने भरपूर बरसात की मांग की थी और मैं भरपूर ही दे रहा हूं। गांव वालों को अपनी गलती का एहसास हुआ और फिर इंद्र देव से प्रार्थना की,कि है ईश्वर अब बस करो । ईश्वर ने उनकी सुनी और बरसात थम गई ।धीरे-धीरे पानी उतर गया और गांव वाले फिर अपने गांव में आकर अपने काम में लग गए।
"सच ही कहा है कि उतना ही मांगो जितना कि पर्याप्त हो ,भरपूर के लालच में नहीं पड़ना चाहिए।"
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