शनिवार, 21 जनवरी 2023

नर से नारायण-- कविता

 भांति भांति के जतन करके हारा मैं, 

 ढूंढता रहा कहां कहां सहारा मैं।

अब तो तय है और समय मैं न गवाऊं,

  अब तो बस नर से नारायण को पाऊं।


यह जग तो है बस झूठी ही माया,

 यहां कौन इसे कब समझ है पाया।

 नर को समझा महज एक माटी का पुतला,

  यही विचार तो क्यों मस्तिष्क में उछला।


नभ में ढूँढा,धरा पर भी खोज लिया,

हर जतन,हर तरह, हर रोज किया।

अब तो बस नर के आगे ही शीश झुकाऊं,

नहीं कहीं और,नर से ही नारायण को पाऊँ।

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