गण और तंत्र में,
अजीब सी कशमकश है।
कौन किस पर भारी है,
बड़ा असमंजस है।
गण चाहे तंत्र,
हमारे हिसाब से चले।
और तंत्र चाहे,
गण हमारे सांचे में ढले।
तंत्र की अपनी ही ,
कुछ सीमाएं हैं।
लेकिन गण की,
अपनी आशाएं हैं।
समझोता जो हो जाए,
गण में और तंत्र में,
तो सच में यह,
आदर्श गणतंत्र हो जाए।
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