दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं,
जख्म कैसे भी हो कुछ रोज में भर जाते हैं।
मंजिल तक पहुंचना है,पहुंच नहीं पाते हैं,
राह में आई बाधाओं को पार नहीं कर पाते हैं।
खुशियों के पल तो हैं चार दिन के,
आते हैं और यूं ही गुजर जाते हैं।
जाने कहां चला जाता है स्वाभिमान,
गये-गुजरों के आगे सर झुकाते हैं।
जो चलते हैं सिर्फ अपनी मनमर्जी से,
इनको भला कोई क्यों समझाते हैं।
वृक्ष कितने भी आच्छादित हो जाएं,
एक दिन तो ठूंठ बन ही जाते हैं।
क्यों तिजारत करें हम किसी की,
खामखां वे खुदा बन जाते हैं।
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