*विजयी रचना --*
जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे,
मैं उनसे मिलने उनके पास चला जाऊंगा।
नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊंगा,
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर,
कुछ तेरूंगा और डूब जाऊंगा।
मैं तो ठहरा एक ठहरा हुआ पानी,
नदी के जल को कहां है फुर्सत रुकने की।
वह तो अविरल बहता ही रहता है,
कल कल मधुर संगीत सुनाता रहता है।
यदि मैं ऐसे ठहरा ही रहा तो,
जल जैसा मन प्रदूषित हो जाएगा।
ग़र नदिया से जो जा मिलूंगा,
तो मन स्वच्छ पारदर्शी हो जाएगा।
एक उफनती नदी को कहां है फुर्सत,
कि वह कुछ पल भी ठहर जाए,
वह तो अविरल चलने की आदी है,
अपने जल को यहां से वहां पहुंचाती है।
अपने मन के भावों को अपने में ही न सिमटा लूं,
उदार दिलों से मिलकर अपने भावों को विस्तार दिला दूँ।
वे न आएं मेरे पास तो न आएं,
मैं तो किंचित भी नहीं सकुचाऊंगा।
मैं उनसे मिलने की खातिर,
उनके पास चला जाऊंगा।
*दूसरी रचना--*
जिंदगी यह कैसी है जिंदगी,
कभी लगती है उलझी हुई पहेली।
और कभी मेरे संग संग चलती,
मेरी अतरंग सी सहेली।
कभी सपाट राहों पर सरपट दौड़ती,
कभी गड्ढों भरी राहों पर उछलती कूदती।
चिंघाड़ती अनवरत चलती ही रहती,
कभी अचानक मौन हो ठहरती।
कभी लगता है यहां अपनों का मेला है,
कभी लगता हर इंसान यहां तो अकेला है।
कभी जलेबी सी उलझी पर मीठी लगती,
और कभी लगता यह तो झमेला है।
एक उम्र तक करते रहे बन्दगी,
झुकती कमर सी लगती है जिंदगी।
कभी नित नई आशाएं लिये हुए,
दुल्हन नवेली सी लगती है जिंदगी।
जिंदगी जीते जीते निकल गई हैजिंदगी
उमंग है दिल में फिर से मिलेगी नई जिंदगी।
ना मिली चाही गई ठंडक न मिली उष्णता,
कभी तो दाल जैसी गलेगी जिंदगी।
*चार पंक्तियां--*
कर्म करें ऐसा ना किसी की हानि हो,
हर्षित हो, मन में ना कोई ग्लानि हो।
सर्व हित ही कार्य करेंगे हम,
न किसी भी रुप में मनमानी हो।
सतीश गुप्ता 'पोरवाल', जयपुर।
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