रविवार, 26 मार्च 2023

शोर ही शोर- ग़ज़ल

 जिधर देखो उधर मचा शोर ही शोर है ,

तसल्ली का तो नजर आता नहीं कोई छोर है।

 चुरा लिया जिसने उसका सुख-चैन,

  वह खुद नहीं कोई चितचोर है।

 नजरें उठाकर देखा जो खुले आसमां की ओर,

पाया कि वहां तो घटा घनघोर है।

 कद काठी तो बना ली बहुत ही खूबसूरत,

  पर दिल का देखो कितना कमजोर है।

  असल में क्या होना है उसको, नहीं जानता,

 लेकिन दिखावे का तो जोर पुरजोर है।

 नहीं पिघलता किसी का दुख दर्द देखकर, 

 देखिए इंसान हो गया कितना कठोर है।

 मैं यहां जाऊं या मैं वहां जाऊं,

 सोचता ही रहता नहीं मिलता कोई ठौर है। 

 दिखता तो है जैसे हो आला जनाब, 

लेकिन अंदर से देखो तो आदमखोर है।

आदमी आया था यहां इंसान बनने को,

 लेकिन आदमी भी न रहा देखो कैसा दौर है। 

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