शनिवार, 4 मार्च 2023

छवी दिलदार की-- कविता

 

कोरा कागज था अभी तक मन मेरा , 

नहीं डाला था अभी तक किसी ने डेरा।

आ गई है अब सुहानी लहर बहार की, 

मेरे मन बसी छवि दिलदार की।


भटक रहा था शून्य में और अनंत में,

 कोई तो मिले जिसे बसाऊँ मन में ,

मुझे तो थी तलाश बसंत बहार की, 

अब मेरे मन बसी छवि दिलदार की।


न जानू मैं उसके दिल में है क्या,

 मेरे बारे में सोचती है क्या वह भला। 

क्या बताऊं मैं बातें गुले गुलजार की 

अब तो मेरे मन बसी छवी दिलदार की।


स्वरचित-सतीश गुप्ता पोरवाल

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