शनिवार, 18 मार्च 2023

मैं हूँ,बस मैं ही-- ग़ज़ल

  ग़मों पर देखो खुशियों का पर्दा डाला हुआ है, 

 जाने किसकी मिसाल,किसका हवाला हुआ है।

  मैं हूं ,बस में ही हूं ,और कोई नहीं,

 ऐसा भ्रम अनेकों ने पाला हुआ है।

अंधेरों की और बढ़ा हूं मैं जब जब भी, 

 जाने कहां से आकर उजाला हुआ है।

 फिसल पट्टी पर जैसे फिसल रहा था दिल,

 क्या बताएं  तुम्हें कैसे संभाला हुआ है। 

 क्या करें, कैसे करें,समझ नहीं आता,

यह जीवन तो मकड़ी का जाला हुआ है।

 सांप बन कर लिपटा था जो गले से,

 न जाने कैसे वह माला हुआ है।

 गमगीन था जो एक लंबे अरसे से,

 वह दिल अब मतवाला हुआ है।  

 झूठों की इस फरेबी दुनिया में, 

 सच का ही अक्सर मुंह काला हुआ है। 

 कौन हूं,क्या हूं पूछते हैं लोग अक्सर मुझसे,

 जवाब हमने अब तक टाला हुआ है।

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