शुक्रवार, 3 मार्च 2023

फुलेरा होली - संस्मरण

 बचपन से ही मैं बड़ा संकोची स्वभाव का था। दोस्त स्कूल में थे लेकिन उनसे दोस्ती स्कूल तक ही सीमित थी।  पड़ोस में भी बराबर के लड़कों से दोस्ती थी लेकिन सीमित ही थी , हमजोली जैसा कुछ नहीं था । कालांतर में स्कूली शिक्षा पूरी हुई,फिर महाविद्यालय की शिक्षा पूरी प्राप्त की और रुड़की विश्वविद्यालय से टेलीविजन में शिक्षा प्राप्त करने के बाद दूरदर्शन मुंबई में नियुक्ति हुई। 

   "लड़की" देखने का दौर चल रहा था। यह दौर इंदौर में जाकर संपन्न हुआ,और वही "लड़की" अंततः मेरी पत्नी बनी। जीवन में पहली बार किसी से इतनी अंतरंगता हुई और मैंने अपनी पत्नी को ही अपनी "हमजोली" मान लिया। होली के अवसर पर मैंने कुछ छुट्टियां  लीं और निश्चय किया कि कुछ दिन इंदौर रहूंगा पत्नी के साथ और फिर अपने घर जाकर अपनों के साथ।

  जिस दिन मैं इंदौर पहुंचा वह था "फुलेरा होली" का दिन। अपनी ससुराल पहुंचने से पहले ही मैंने रास्ते में कुछ फूल खरीद लिये। प्रारंभिक चाय नाश्ते के बाद,मैं अपने पत्नी का इंतजार कर रहा था कि वह आएगी तो मैं फूलों से उसका स्वागत करूंगा। वह आई भी और कमरे की चौखट से अपना चांद सा मुखड़ा दिखाया। मैं तैयार ही था मैंने फूलों को हाथों में लेकर उसकी और उछाला। लेकिन यह क्या, वह तो एक ओर हो गई और उसी वक्त हमारी सासु जी ने प्रवेश किया।  वे सारे फूल जो पत्नि की ओर उछालना चाहता था, सासू जी पर पहुंच गए। उन्होंने पूछा-कंवर साहब यह क्या? मैं सकुचा गया लेकिन तुरंत बात बदल कर बोला - मैं इंतजार ही कर रहा था कि आप आएंगी और आपका स्वागत फूलों से करूंगा। वे हौले से मुस्कराई , उनके चेहरे से लग रहा था जैसे वह कर रही हो कि मैं सब जानती हूं कि आप क्या चाहते  हो।उन्होंने मेरी पत्नी को आवाज दी और वे फूल वापस मेरी अंजली में रख दी और कहा कि लो जो करना था ,वह अब करो । एक पल को तो मैं सकुचा गया लेकिन फिर वही किया जो करना था।  अब सकुचाने की बारी मेरी पत्नी की थी।वह आकर पास बैठ गई , सासूजी वापस जा चुकी थीं।,और हम आपसी वार्तालाप में संलग्न हो गए। शाम होने को आई थी मेरे सालों ने कहा कि जीजाजी चलो आज फिल्म देखने चलते हैं।मैंने सोचा चलो अच्छा है पत्नि और सालों के साथ थोड़ा बाहर जाने और फिल्म देखने का मौका मिलेगा । लेकिन फिर यह क्या ! मेरे दोनों साले तैयार होकर आ गए और कहा चलो जीजाजी पिक्चर चलते हैं ।तो मैं अपने दोनों सालों के साथ पिक्चर देखने गया, लेकिन फिर  यह क्या! फिल्म का पोस्टर देख कर मैंने अपने सालों को कहा, भाई यह क्या मैं तो अपनी पत्नी को देखने आया था और तुम "माँ" दिखा रहे हो।दरअसल उस सिनेमा हॉल में फिल्म "माँ" चल रही थी।खैर मुझे वहां "मां" देखनी पड़ी ।

 मैं सोचने लगा कि फिल्मकारों ने "माँ" तो बनाई, पत्नी नाम से फिल्म क्यों नहीं बनाई।

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