रामेश्वर लाल जी खाना खाने के बाद ,भरी दोपहर में छाता लगाकर घर से बाहर निकले, दुकान जाने के लिए। दुकान पास ही थी तो वे पैदल ही आया-जाया करते थे।थोड़ी दूर जाने पर उन्हें सड़क के किनारे एक रिक्शेवाला कड़क धूप में भी रिक्शे में सोते हुए दिखा। सब रिक्शे वाले तो घर चले गए लेकिन वह इस तपती धूप में भी यहां बैठा था। उन्हें उस पर दया आई, उन्होंने सोचा कि पैदल जाने के बजाय रिक्शा से चला जाए। वे जानबूझकर रिक्शे से गये और उसे तय किया हुआ भाड़ा दिया। दो-तीन दिन इसी तरह निकलने के बाद उन्होंने देखा कि आज तो उसने अच्छे धुले हुए कपड़े पहने हुए थे।रिक्शे पर बैठते हैं उन्होंने पूछा-क्या भाई आज तो बड़े स्मार्ट लग रहे हो , तो उसने कहा कि कल मैं बाजार से साबुन लाया था उससे कपड़े धोए इसलिए साफ लग रहे हैं ।रामेश्वर लाल जी उसके रिक्शे का इस्तेमाल ज्यादा ही करने लगे,बाजार से दुकान पर सामान लाने के लिए एवं अन्य कार्यों के लिए। कुछ दिन के बाद उनको उस रिक्शे वाले में परिवर्तन दिखाई दिया ।उन्होंने पूछा कि आज तो ज्यादा खुश दिखाई दे रहे हो, तो रिक्शा वाले ने कहा कि सेठ जी बहुत दिनों के बाद कल मैं बच्चों को बाजार ले गया कुछ खरीदा और आइसक्रीम भी खिलाई , पत्नी और बच्चे बहुत खुश थे । रामेश्वर लाल जी ने देखा कि रिक्शावाले के चेहरे पर एक सुकून और खुशी दिखाई दे रही थी।
लेकिन यदि वास्तव में कोई देखता तो पाता कि उससे ज्यादा चमक रामेश्वर लाल जी के चेहरे पर थी , किसी गरीब की सहायता करके उसकी जिंदगी खुशहाल करने की चमक।
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