मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

अभागन

          .    (एक मार्मिक लघुकथा) 

     अरे ओ बंसी , जा रस्सी लेकर आ और बांध दे इसके हाथ और पैर । आज फैसला हो ही जाए , दो  साल से खुद तो फोकट का खा ही रही है और एक बच्चा और पैदा कर दिया, इसको भी हम ही खिलाते रहें, हराम का पैसा है क्या हमारे पास , इसका बाप तो आगे कुछ देता नहीं । कहा था हमने,  जो दिया था.वह क्या जिंदगी भर चलेगा ? दो लाख और दे दो लेकिन , इसके बाप के कान में जूं भी नहीं रेंग रही, आज तो अंतिम फैसला होकर ही रहेगा । बंसी ने जैसे ही उसके हाथ और पैर बांधे , मां के कहने पर सबसे पहले बंसी ने ही उद्घाटन किया और  डंडे मार मार कर अपनी पत्नी को बेहाल कर  दिया । फिर मां डंडा अपनी बेटी को देते हुए  बोली , ले अब तेरा नंबर आ गया , मोबाइल चाहिए था ना तेरे को , नहीं मिला , तो दे दे अब सजा । और बेटी शुरू हो गई- दे दनादन, दे दनादन  । मां ने अब बेटी से डंडा लेकर बेटे को दिया और कहा- ले तेरे को मोटरसाइकिल चाहिए थी ना , नहीं मिली तो ले तू भी ले बदला । देवर ने भाभी की मार मार कर चमड़ी उधेड़ दी । मां ने छोटे बेटे से डंडा लेकर फिर से बंसी को देते हुए कहा कि,ले और अब अंतिम क्रिया कर ही दे ।बंसी ने डंडा उठाया और पूरे वेग से उस "अभागन" के सिर पर मार दिया । बेचारी बहू अब अंतिम सांस तक पहुंचते पहुंचते , मन ही मन बुदबुदाई - पिताजी मुझे माफ कर देना , मैं असमय.ही जा रही हूं , मैं आपको कंगाल नहीं कर सकती थी और इसीलिये मैंने आपको ,  इनकी मांग पूरी करने को मना किया ।  पिताजी , आपने कहा था कि बेटी खड़ी हुई ससुराल जाती है  और वहां से निकलती है- लेटी हुई । मुझे संतोष है कि मैंने आपका कहा पूरा किया । एक हिचकी आई और बस - - - - -

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