नहींं मिलता बुजुर्गों को यथोचित सम्मान
"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""" बड़ी कोफ्त होती है ,दिल में गहरी टीस उठती है , उदासी छा जाती है मन पर- यह सोचते हुए कि आखिर आज के जमाने में , बुजुर्गों को वह यथोचित सम्मान क्यों नहीं मिल पाता , जिसके कि वे हकदार हैं । जन्म से युवा होने तक जो मां-बाप अपरिहार्य होते थे वे अब परिहार्य कैसे हो गए हैं । कहा यही जाता है कि बचपन व युवा अवस्था, चाहे कैसी भी गुजरे ,लेकिन वृद्धावस्था, किसी भी व्यक्ति की ,सुख व शांति से गुजरनी चाहिए । लेकिन कई बुजुर्गों के साथ एेसा नहीं हो पाता ।आईये , हम कुछ उदाहरणों से देखें कि , बुजुर्गों को कैसी-कैसी अवस्था से दो चार होना पड़ता है ।
1) एक बीमार और विक्षिप्त बुजुर्ग को ,उसके दो बेटे एक कार में लेकर आते हैं और सड़क के किनारे , सुनसान जगह पर डाल कर चले जाते हैं । एक राहगीर उन्हें देखकर पुलिस में खबर करता है , पुलिस वाले उसे उठाकर ले जाते हैं और पूछताछ करने पर वह अपना पता बता देते हैं । पुलिस वाले उन्हें वापस अपने बेटों के पास पहुंचाते हैं और हिदायत देते हैं कि उन्हें ठीक से रखें ।
2) एक बुजुर्ग मां बाप को , एक बेटा अपने घर से बाहर निकाल देता है ,सामान सहित । वह बुजुर्ग दम्पति मकान के बाहर , फुटपाथ पर ही डेरा जमा लेते हैं । यह खबर जब एक स्वयंसेवी संस्था को लगती है तो उसके नुमाइंदे आते हैं और उस दंम्पति को अपनी संस्था में ले जाते हैं । बाद में उनके बेटे को समझा बुझाकर दंम्पति को वापस घर पहुंचाते हैं ।
3) एक उच्चाधिकारी के स्वर्गवास के बाद, उनकी पत्नी को बेटा और बहु मिलकर अपने मकान के "गैराज पोर्शन" में रख देते हैं और सुबह शाम खाने की थाली वही पहुंचा दी जाती है । एक महिला को नौकरी पर रखा जाता है ,जो दिन भर उन की देखभाल करती है । मां का इमारत के मुख्य भाग में आना -जाना मना है ।
ये तो वे घटनायें थीं जो समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुकी हैं । इसके अलावा ऐसे भी उदाहरण देखने को मिलते हैं कि एक ही सन्तान होने के बावजूद भी बुजुर्गों को अलग से किराए से मकान लेकर रहना पड़ता है । एक से अधिक सन्तान होने पर भी कुछ , बहानाबाजी करते हुए, बुजुर्गों को अपने पास नहीं रखना चाहते । कहते हैं कि दो बर्तन पास पास होंगे तो टकरायेंगे ही और आवाज भी करेंगे ।।लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि एक बर्तन को उठा कर घर से बाहर कर दिया जाए । यह भी सही है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती । ताली किसी की प्रशंसा करने के लिए बजाई जाए तो सही है , लेकिन डराने या भगाने के लिए बजाई जाए तो किसी भी रुप में सही नहीं मानी जा सकती । ताली बजाने के लिए दोनों हाथ आमने सामने आते हैं और टकराते हैं । कभी ऐसा भी होता है कि दायां हाथ अपनी जगह पर है लेकिन बाया हाथ पूरी दूरी तय करके उससे टकराता। है । कभी ऐसा भी होता है कि बायां हाथ तो अपनी जगह पर है और दायां हाथ पूरी दूरी तय करके उससे टकराता है । आखिर कौनसा हाथ है दोषी ? आज का युवा वर्ग या फिर बुजुर्ग स्वयं ? विषय गंभीर है और इस पर चिंतन , मनन और विश्लेषण करने की आवश्यकता है । मैंने तो ऐसा किया है । क्या आपने भी इस बारे में विचार किया है या करेंगे ? मेरा आप से अनुरोध है कि , इस विषय पर आप भी चिंतन , मनन और विश्लेषण करें और जो निष्कर्ष निकले ,उसे मुझे प्रेषित करें , ताकि मेरे विचार ,जो उपग्रह की भांति शून्य में विचरण कर रहे हैं उन्हें दिशा और गति मिले और वे धरा पर आते हुए आलेख का रूप ले सकें ।आपके और हमारे विचारों से ऐसा आलेख तैयार हो ,जिसके पठन से ,यदि स्थिती में कुछ सुधार आ जाये , तो यह एक सकारात्मक कदम होगा ।
सतीश कुमार गुप्ता
"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""" बड़ी कोफ्त होती है ,दिल में गहरी टीस उठती है , उदासी छा जाती है मन पर- यह सोचते हुए कि आखिर आज के जमाने में , बुजुर्गों को वह यथोचित सम्मान क्यों नहीं मिल पाता , जिसके कि वे हकदार हैं । जन्म से युवा होने तक जो मां-बाप अपरिहार्य होते थे वे अब परिहार्य कैसे हो गए हैं । कहा यही जाता है कि बचपन व युवा अवस्था, चाहे कैसी भी गुजरे ,लेकिन वृद्धावस्था, किसी भी व्यक्ति की ,सुख व शांति से गुजरनी चाहिए । लेकिन कई बुजुर्गों के साथ एेसा नहीं हो पाता ।आईये , हम कुछ उदाहरणों से देखें कि , बुजुर्गों को कैसी-कैसी अवस्था से दो चार होना पड़ता है ।
1) एक बीमार और विक्षिप्त बुजुर्ग को ,उसके दो बेटे एक कार में लेकर आते हैं और सड़क के किनारे , सुनसान जगह पर डाल कर चले जाते हैं । एक राहगीर उन्हें देखकर पुलिस में खबर करता है , पुलिस वाले उसे उठाकर ले जाते हैं और पूछताछ करने पर वह अपना पता बता देते हैं । पुलिस वाले उन्हें वापस अपने बेटों के पास पहुंचाते हैं और हिदायत देते हैं कि उन्हें ठीक से रखें ।
2) एक बुजुर्ग मां बाप को , एक बेटा अपने घर से बाहर निकाल देता है ,सामान सहित । वह बुजुर्ग दम्पति मकान के बाहर , फुटपाथ पर ही डेरा जमा लेते हैं । यह खबर जब एक स्वयंसेवी संस्था को लगती है तो उसके नुमाइंदे आते हैं और उस दंम्पति को अपनी संस्था में ले जाते हैं । बाद में उनके बेटे को समझा बुझाकर दंम्पति को वापस घर पहुंचाते हैं ।
3) एक उच्चाधिकारी के स्वर्गवास के बाद, उनकी पत्नी को बेटा और बहु मिलकर अपने मकान के "गैराज पोर्शन" में रख देते हैं और सुबह शाम खाने की थाली वही पहुंचा दी जाती है । एक महिला को नौकरी पर रखा जाता है ,जो दिन भर उन की देखभाल करती है । मां का इमारत के मुख्य भाग में आना -जाना मना है ।
ये तो वे घटनायें थीं जो समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुकी हैं । इसके अलावा ऐसे भी उदाहरण देखने को मिलते हैं कि एक ही सन्तान होने के बावजूद भी बुजुर्गों को अलग से किराए से मकान लेकर रहना पड़ता है । एक से अधिक सन्तान होने पर भी कुछ , बहानाबाजी करते हुए, बुजुर्गों को अपने पास नहीं रखना चाहते । कहते हैं कि दो बर्तन पास पास होंगे तो टकरायेंगे ही और आवाज भी करेंगे ।।लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि एक बर्तन को उठा कर घर से बाहर कर दिया जाए । यह भी सही है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती । ताली किसी की प्रशंसा करने के लिए बजाई जाए तो सही है , लेकिन डराने या भगाने के लिए बजाई जाए तो किसी भी रुप में सही नहीं मानी जा सकती । ताली बजाने के लिए दोनों हाथ आमने सामने आते हैं और टकराते हैं । कभी ऐसा भी होता है कि दायां हाथ अपनी जगह पर है लेकिन बाया हाथ पूरी दूरी तय करके उससे टकराता। है । कभी ऐसा भी होता है कि बायां हाथ तो अपनी जगह पर है और दायां हाथ पूरी दूरी तय करके उससे टकराता है । आखिर कौनसा हाथ है दोषी ? आज का युवा वर्ग या फिर बुजुर्ग स्वयं ? विषय गंभीर है और इस पर चिंतन , मनन और विश्लेषण करने की आवश्यकता है । मैंने तो ऐसा किया है । क्या आपने भी इस बारे में विचार किया है या करेंगे ? मेरा आप से अनुरोध है कि , इस विषय पर आप भी चिंतन , मनन और विश्लेषण करें और जो निष्कर्ष निकले ,उसे मुझे प्रेषित करें , ताकि मेरे विचार ,जो उपग्रह की भांति शून्य में विचरण कर रहे हैं उन्हें दिशा और गति मिले और वे धरा पर आते हुए आलेख का रूप ले सकें ।आपके और हमारे विचारों से ऐसा आलेख तैयार हो ,जिसके पठन से ,यदि स्थिती में कुछ सुधार आ जाये , तो यह एक सकारात्मक कदम होगा ।
सतीश कुमार गुप्ता
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