एक से एक लड़कियों की कुंडलियां आने लगी थीं पर उन्होंने अपने विलायती पुत्र के लिए एकदम ही देसी कन्या ढूंढ कर वाग्दान कर दिया।दरअसल एक घटनाक्रम के अंतर्गत ऐसा हुआ
कांतानाथ जी का बेटा मधुर विलायत में एक अच्छी नौकरी कर रहा था। मधुर के पिताजी कांतानाथ जी एवं माताजी को उसके विवाह की चिंता थी तो उन्होंने समाचार पत्रों में विज्ञापन दिया और कन्याओं के प्रस्ताव और कुंडलियों के ढ़ेर लग गए। जब मधुर कुछ छुट्टियां लेकर भारत आया तो ये सब प्रस्ताव उसे दिखाए गए उनमें से मधुर को वही लड़की पसंद आई जो उसके माता-पिता को भी पसंद आई थी, कद-काठी अच्छी थी सुंदरता में कोई कमी नहीं और पहने लिबास से उसे लगा कि वह विलायत में उसके साथ बराबरी की रहेगी । रात्रि को वह मोबाइल देखते हुए अकेले ही कल्पना में उसके साथ फेरे लगाने लगा। सातवां फेर पूरा हुआ ही था कि उसको एक रील नजर आई जिसमें वह अश्लील दृश्य प्रस्तुत कर रही थी। उसकी कुछ और रील देखकर उसका सिर चकरा गया। सुबह पिताजी को यह बात बताई तो उन्होंने सोचा कि पढ़ाई लिखाई रहन-सहन और लिबास पर जाने के बजाय सुसंस्कृत लड़की ही ठीक रहेगी।पड़ोस में ही ऐसी लड़की पर उनकी निगाह गई और बातचीत कर संबंध पक्का कर दिया गया।आनन-फानन में तीसरे दिन पंडित जी को बुलाकर शगुन करवा दिया गया।मधुर मन ही मन सोचने लगा ,सात फेरे उसने मन ही मन ले लिए थे लेकिन यथार्थ में तो अब होने वाले सात फेरे ही महत्वपूर्ण होंगे।
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