मुझे कुछ खबर नहीं मैं कहां हूं
अभी तो मैं खुद की तलाश में हूं।
विचरण कर रहा था ब्रह्मांड में
अनंत में था या शून्य में
किसी पर्वत शिखर पर ध्यान मग्न
या फिर सागर की गहराई में डूबा हुआ
मालूम नहीं क्यों कहीं गया
अकेला ही हूं या अपनों के साथ में हूं
अभी तो मैं ख़ुद की तलाश में हूं
कोई कहता मैं ईश्वर का भक्त हूं
कोई कहता कि ठहरा हुआ वक्त हूं
ना मालूम किस खोज में चलता रहा
ना जाने किस-किस की सुनता रहा
कोई कहता कि मैं एक साधारण इंसान हूं
कोई कहता कि ईश्वर की संतान हूं
बागों में अनेकों किस्म के हैं फूल
भंवरे मुझे ढूंढते हैं कहां-कहां
मैं तो छिपा फूल पलाश में हूं।
मुझे मालूम है तो सिर्फ इतना कि
मैं अभी तक जिंदा अपनी लाश में हूं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें