गुरुवार, 22 जून 2023

जिंदगी -- कविता


 जिंदगी यह कैसी है जिंदगी,

 कभी लगती है उलझी हुई पहेली।

और कभी मेरे संग संग चलती,

 मेरी अतरंग सी सहेली।

 कभी सपाट राहों पर सरपट दौड़ती,

  कभी गड्ढों भरी राहों पर उछलती कूदती।

  चिंघाड़ती अनवरत चलती ही रहती,

  कभी अचानक मौन हो ठहरती।

 कभी लगता है यहां अपनों का मेला है,

  कभी लगता हर इंसान यहां तो अकेला है।

 कभी जलेबी सी उलझी पर मीठी लगती,

और कभी लगता यह तो झमेला है।

 एक उम्र तक करते रहे बन्दगी,

 झुकती कमर सी लगती है जिंदगी।

 कभी नित नई आशाएं  लिये हुए,

   दुल्हन नवेली सी लगती है जिंदगी।

 जिंदगी जीते जीते निकल गई है जिंदगी,

 उमंग है दिल में फिर से मिलेगी नई जिंदगी।

 ना मिली चाही गई ठंडक न मिली उष्णता,

  कभी तो दाल जैसी गलेगी जिंदगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें