नादान जिंदगी हादसों में उलझी हुई है,
नहीं यह ऐसी पहेली जो सुलझी हुई है।
कितनी भी बुझाना चाहो भड़कती आग को,
पर क्या करोगे उस चिंगारी का जो सुलगी हुई है।
राहों में सरपट चलने का इरादा था,
मंजिल तक पहुंचने का वादा था।
लेकिन कोशिश हमारी रंग नहीं ला पाई,
क्योंकि वक्त कम और फासला ज्यादा था।
कोई बताए किस्मत पर भरोसा करें या न करें,
जो भी जिंदगी में मिले उसे सहन करें या न करें।
जिंदगी तो जीने के लिए मिलती है,
फिर जिंदगी के लिए हम क्यों मरें।
सोचता हूं राह में रुकुं या चलता चलूँ,
दिल के दुख किसी को कहूं या ना कहूं।
असमंजस के इस भँवर से बाहर निकलकर,
जिंदगी की पहेली को शायद सुलझा सकूं।
Mssa/दैनिक
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