क्या हो हमराह या हमसफर
वादे तो तुमने कर दिए अब तक हजार,
लेकिन वह नहीं कहा जो कहना है सिर्फ एक बार।
जानती हूं मैं, कब से मेरे हमराही हो,
मैं तो सिर्फ एक फूल और तुम फूलों की डाली हो।
जब भी कोई मुसीबत हुई तुमने ही सहारा दिया,
कभी भी परायापन नहीं अपनापन दिखा दिया।
सोचती हूं कैसी होगी वह जिंदगी जब हम तुम एक होंगे,
तुम औरों की तरह नहीं तुम्हारे तो इरादे नेक होंगे।
कब तक यूं अकेले अकेले चलते रहेंगे,
सिर्फ बातें करेंगे और मिलते रहेंगे।
क्या हम ऐसे ही अलग-अलग जिंदगी करेंगे बसर,
सच-सच बताओ तुम मेरे क्या हो, हमराह या हमसफर।
Mssa/दैनिक
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