बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

तारे तोड़ लाऊँ-- कविता

 अक्सर इस जहां में यही होता है,

दो प्राणियों के बीच वार्तालाप होता है।

 एक कहती है तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो 

 दूसरा कहता है कहो जो तुम कह सकती हो।

मुझमें जोश और जुनून भरपूर था,

 प्यार के नशे में चूर चूर था।

  मैंने फिर कहा अजी कुछ तो फरमा दो,

  उसने कहा तुम से नहीं होगा जाने दो।

  मैंने कहा तुम कहो तो आसमान से तारे तोड़ लाऊं,

 उसने कहा यदि ऐसा करो तो तुम्हें मान जाऊं।

  लेकिन ठहरो ऐसा ना हो कि तुम आसमान में खो जाओ,

 और जगह पसंद आ गई तो कहीं  वहीं के हो जाओ।

इसलिए मैं भी तुम्हारे साथ ही चलूंगी, 

 और अच्छे-अच्छे तारे देख कर चुनूंगी। 

मुझे लगा जैसे बनता हुआ मकान धंस गया हो,

 जैसे शिकारी खुद अपने जाल में फस गया हो।

 मेरे शैतानी दिमाग में एक युक्ति आई,

उसी युक्ति के सहारे मुश्किल से मुक्ति पाई।

 मैंने उसे बड़े प्यार से गोद में उठाया,

 उठा कर बाहर खुले में लेकर आया।

 मैंने कहा देखो चांद में तो कितने हैं दाग,

 लेकिन तुम्हारा चेहरा तो है कितना बेदाग।

 चांद तुम्हारी सुंदरता का क्या 

 मुकाबला करेगा,

 मुकाबले में तो निश्चित ही वह हारेगा। 

 यह सुनकर वह इतनी खुश हो गई,

  कि तारे तोड़ने वाले बात ही भूल गई।

 अब तो जान बची और हजारों पाए,

   समझदार होकर हम घर को आए।

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