नाम तो उसका शांति था लेकिन उसके जीवन में अशांति ही अशांति फैल चुकी थी। उसका पति आलसी किस्म का इंसान था , नौकरी करता था लेकिन मन नहीं लगता था। एक जगह नौकरी छोड़ता, दूसरी जगह करता। फिर छोड़ता तीसरी जगह करता। जैसे तैसे घर का खर्च चल रहा था ।गृहस्थी के खर्चे पूरे नहीं हो पा रहे थे। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई , घर के खर्चों से परेशान होकर एक दिन वह घर छोड़ कर चुपचाप कहीं चला गया। बस उसी दिन से शांति के जीवन में अशांति का पैमाना बढ़ता चला गया। एक तो पति के चले जाने का गम और दूसरा गृहस्थी का खर्चा। ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी , अतः उसने लोगों के घर का काम ही करना उचित समझा।आसपास के कुछ घरों में उसे काम मिल गया और घर की सफाई कपड़ों की धुलाई आदि का काम उसे मिला , जिससे जैसे-तैसे गृहस्थी की गाड़ी आगे बढ़ने लगी।लेकिन बच्चों की पढ़ाई, कपड़ों की मांग और घर के रोजमर्रा के खर्चों से वह परेशान रहने लगी।
रात को सब कामों से मुक्त होने के बाद वह अपने हाथों को देखती , उसे लगता है कि उसके हाथों की चमड़ी घिसती जा रही है । कहीं-कहीं से कटती भी जा रही है। कभी वह अपने हाथों को देखती , कभी अपने बच्चों को। उसको रोना आ जाता और आंखों से आंसू बहने लगते। ऐसा अक्सर होता और ऐसे ही दिनचर्या चलती रही।
एक दिन सूर्योदय भी नहीं हुआ था कि दरवाजे पर खटखट की आवाज हुई। उसे आश्चर्य हुआ कि सुबह-सुबह कौन आ गया। जाकर दरवाजा खोला तो आश्चर्य से मुंह खुला का खुला रह गया। सामने उसका गुमशुदा पति खड़ा हुआ था। पति की आंखों में आंसू थे,उसने कहा मुझे माफ कर देना जो गलती मुझसे हुई है वह माफी के काबिल तो नहीं है फिर भी मैं आशा करता हूं कि तुम मुझे माफ कर दोगी।अब मैं एक जगह रह कर मन लगाकर काम करूंगा और तुम्हें कोई काम नहीं करने दूंगा ।
शांति की आंखों से बहते आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे , लग रहा था जैसे आज तो आंसुओं से एक नया समंदर बन जाएगा।
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