मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

मुक्तक

तू महफ़ूज़ है जब तक मैं हूँ,

अपनी मुश्किलों का न कर जिक्र।

मैं जिल्द बन कर तुझे सुरक्षित रखूँगा,

अब न कर तू किसी बात की फिक्र। (1) 

शफक़त समाये दिल में जैसे सागर में जल,

 दुआ मिलेगी हजारों आज नहीं तो कल।

 जरूरत मंद लोगों की ओर बढ़ाये जो हाथ,

  तो सही माने में तभी जिंदगी है सफ़ल। (2)

चमन न उजड़े कुछ बहारें मांग लूं ,

कश्ती को विराम दे वो किनारे मांग लूं ,

जिंदगी तो हिचकोले खा रही, 

बेसहारा हूं  कुछ सहारे मांग लूं .(3)

आसमाँ से कुछ सितारे मांग लूं, 

दिल को सुकून दे वो नजारे मांग लूं, 

लहरों का उफान मुझे मंजूर नहीं, 

रोक दे इन्हें वो किनारे मांग लूं. (4)

दर्द-ए-ग़म को यूं हवा न दीजिए जनाब ।

मेरे घर को अपना घर बना ले वह मेहमान न आए ।(5)

तेरी याद में कब तक तड़पता रहूंगा मैं ।

अब तो जिसकी सुबह न हो वह शाम न आए ।(6)

गम क्यों करें जब दुनियां में खुशियाँ हैं हजार,

 यह जीवन नहीं मिलता हर हमें बार-बार।

 जी लो जिंदगी को खुशियों के संग-संग,

 फिर तो आ जायेगी जीवन में बहार।(7)

होली का माहौल है और चढा ली भंग,

 मस्ती सब पर चढ गई मचा रहे हुड़दंग।

 भोले भाले हम जैसे जोड़ रहे हैं हाथ,

  अरे दूर भी हटो मत करो हमें तंग।(8)

तू न मानेगी ,मैं ना मानूंगा ,

 तू आगे आगे मैं पीछे भागूंगा।

 केवल लाल गुलाबी पीला नहीं ,

  मैं तुझ पर मिक्स रंग डालूंगा ।(9)

न समझो कि बेरूखियां हमारी तरफ से हैं,

दरअसल कुछ मजबूरियां दोनों तरफ से हैं।(10)

  यूं ही नहीं खुश नजर आते हम दोनों,

  देखिए कुछ खूबियां दोनों तरफ से हैं।(11) 

और न पिलाओ हमें यूं ही मदहोश हैं, 

मदहोशी में हो न जाये कोई ख़राबी। 

इश्क की खुमारी चढ़ गई थी हमें, 

 खुमारी उतर गई इश्क है बाकी (12)

 चेहरे पर मुस्कान आंखों में शरारत,

 कहानी  कहती है जवानी आपकी।(13)

गहन चिंतन मनन से ही, 

सही निष्कर्ष पर पहुंच सकता हूं।

 जा सागर के पूर्ण गर्त में,

 मोती चुन-चुन ला सकता हूं।(14) 

गमगीन रहकर गम क्यों करें,

 आखिर हम आंखें नम क्यों करें।

 हमें तो खुशियों के सैलाब में बहने दो,

 गम करके खुशियां कम क्यों करें। (15)

जिद्द और मैं एक दूसरे के हैं पर्यायवाची,

 दोनों में है यारी-दोस्ती अच्छी खासी।

 लेकिन कभी-कभी जब ठन जाती है,

 तो एक होता है वादी और दूसरा परिवादी।(16)

कांटों सा जीवन जिसका फूलों की सेज नसीब नहीं,

 मंज़िल बस दिखती है उसको लेकिन करीब नहीं। 

दुनियां की प्रतिस्पर्धा में विजय पताका वो फहराता,

धार लिया जिसने मन में या जिसका कोई रकीब नहीं।(17) 





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